भारत में वर्ष का आरंभ चैत्र या कार्तिक मास से होता है। वैदिक वचनों से प्रकट होता है कि वर्ष की गणना पूर्णिमा से होती थी और नया वर्ष फाल्गुनी पूर्णिमा के उपरांत चैत्र में आरंभ होता था। वर्ष की प्रथम ऋतु होती थी वसंत। महाभारत के वनपर्व (130/14-16) में वसंत ऋतु में हुए वर्ष के आरंभ का उल्लेख है। अयोध्या में भगवान श्रीराम माता कौशल्या की गोद में वसंत ऋतु में ही चैत्र शुक्ल नवमी को उतरे थे। गीता में परमात्मा श्रीकृष्ण ने वसंत को अपना ऋतु अवतार कहा है। श्रीकृष्ण ने वसंत के लिए एक सुंदर शब्द कहा है ऋतूनां कुसुमाकरः यानी कुसुमाकर यानी फूलों की खान। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसंत पंचमी या श्रीपंचमी बताकर उस दिन शारदा पूजन का विधान किया है।
छह ऋतुओं में पहली है वसंत -ऋ ग्वेद के पुरुष-सूक्त (10/90) के 16 श्लोक प्रसिद्ध हैं। इसमें हिरण्यगर्भ को देवों ने एक प्रतीकात्मक यज्ञ के रूप में हवि (आहुति) दी है। इसमें तीन ऋतुएं ही आहुति रूप में हैं। वसंत घृत, ग्रीष्म ईंधन एवं शरद हवि हैं। स्पष्ट है कि वसंत ही छह ऋतुओं में पहली है, जो संवत्सरारंभ के समय रहती है। भविष्योत्तर पुराण में आया है कि फाल्गुन पूर्णिमा यानी होली पर जब पतझड़ समाप्त होता है और वसंत ऋतु का आगमन होता है, तब जो व्यक्ति चंदन लेप के साथ आम्र-मंजरी खाता है, वह वर्ष भर आनंद से रहता है। ईसा से आठ शती पूर्व के ग्रीक विद्वान हेसिओड का कथन है कि जाड़े के 60 दिनों के उपरांत वसंत का आगमन होता है। वसंत में रति और कामदेव का पूजन वसंत प्रेम की ऋतु है। इससे ही शास्त्रों ने प्रथम ऋतु दाम्पत्य जीवन में पारस्परिक अनुराग को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए वसंत पंचमी पर प्रेम के देवता काम और उनकी प्रिया रति के पूजन करने का शास्त्रीय विधान किया है। मदनरत्न का कथन है कि इस दिन अशोक के वृक्ष में कामदेव और माता रति की पूजा करने से सुखद दाम्पत्य प्राप्त होता है। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को धर्म से अवरुद्ध काम कहा है। रवाकर भट्ट ने जयसिंह कल्पद्रुम में वसंत पंचमी तिथि को मांगलिक कार्य, विवाह और यात्रा में शुभ दिन कहा है।
ऋग्वेद में प्रमुख नदी है सरस्वती– सरस्वती देवी और नदी, दोनों हैं। विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सरस्वती वास्तव में सिंधु नदी ही है। पर यह कथन स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि त्रॠवेद (10/64/9) में सरस्वती, सरयु और सिंधु नदियों का वर्णन प्रमुख नदियों के रूप में है। प्रो क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय ने आधुनिक सरस्वती की स्थिति को आरंभिक वैदिक काल में भी ज्यों का त्यों माना है। वामनपुराण (32/1-4) में सरस्वती को एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष से निकली हुई माना गया है और कुरुक्षेत्र से गुजरती हुई कहा गया है। इसमें सरस्वती नदी को सहस्रों पहाड़ियों को तोड़ती फोड़ती द्वैत वन में प्रवेश करती हुई दर्शाया गया है। तीर्थराज प्रयाग में तीन नदियां मिलती हैं गंगा, यमुना एवं सरस्वती। सरस्वती दोनों के बीच अंतर्भूमि में है, जिससे इसको त्रिवेणी की संज्ञा मिली है। *
शास्त्रों में सरस्वती की साधना – वेदों से पुराणों तक माता सरस्वती की अद्भुत महिमा है। उन्हें शास्त्रों में वाणी की अधिष्ठात्री, शक्ति तथा संगीत, साहित्य और काव्य की मूल प्रेरणा कहा गया है। वे परमात्मा के मुख से प्रकट होकर मानव को विवेक, विद्या और सौम्यता प्रदान करती हैं। उनका श्वेत, शांत और सत्त्वमय स्वरूप ज्ञान की निर्मलता और कल्याणकारी शक्ति जड़ता दूर करने वाली शक्त्ति कहा गया है|
12वीं शती में कुमारदास द्वारा संकलित सदुक्तिकर्णामृत में कवि अपिदेव लिखते हैं-माता सरस्वती सूर्य की भाति जड़ता को दूर करने वाली शक्ति है, तो कहीं असंख्य तारों की आभा के समान चमत्कार रचती हैं। कहीं वे चंद्रमा की ज्योत्स्रा की तरह मृदुल और शीतलता धारण करती हैं, तो कहीं अग्नि की लपट-सी तिरछी और प्रखर लहराती हैं। वे दीये की उजली लौ के समान प्रकाश फैलाती हैं। देवी सरस्वती की ज्योति विजय का प्रतीक है। ऐसी माता शारदा की हम श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं।
देवीपुराण (अध्याय 45) ने सरस्वती शब्द की व्युत्पत्ति पर कहा है-जो निरंतर प्रवाहित होकर गतिशील रहती है, उसे इस सरणशीलता के कारण सरा कहा गया है। गेय (संगीतात्मक) रूप में उसकी सात धाराएं प्रसिद्ध हैं, जिससे वह सरस्वती कही जाती है। बौद्धों ने भगवान गणेश एवं माता सरस्वती जैसे देव-देवियों को ले लिया है और उनकी स्तुति की है। जैनों ने माता सरस्वती की प्रतिमाओं का निर्माण किया, जिनमें वे हाथ में पुस्तक धारण करती हैं। सरस्वती, लक्ष्मी एक शक्ति हैं। वे भक्तों की कामनापूर्ति तथा राक्षसों के नाश के लिए विभिन्न रूप धारण करती हैं। दुर्गासप्तशती में चंड-मुंड, रक्तबीज और शुभ-निशुंभ राक्षसों की वध करके दुर्गा रूप में माता सरस्वती को प्रतिष्ठित किया है।


